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चैत्र माह इतना महत्वपूर्ण क्यों ? इसी माह क्यों मनाया जाता है हिंदू नव वर्ष ??

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 अयोध्या 25 मार्च 2020 (एसएमएन)-
ब्रह्मा जी ने सृष्टि  व हिंदू नववर्ष का आरंभ  चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि अर्थात प्रतिपदा को किया था। इसी दिन से पेड़-पोधों में फूल ,मंजर ,कली आना शुरू होते है तथा वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है । जीवो में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है । इसी दिन भगवान विष्णु जी का प्रथम अवतार भी हुआ था । नवरात्र की शुरुआत इसी दिन से होती है, जिसमे हमलोग उपवास एवं पवित्र रह कर नव वर्ष की शुरूआत करते है ।
      परम पुरुष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र में ही आता है। इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास को भगवान नारायण का ही रूप माना जाता है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया।

        न शीत न ग्रीष्म पूरा पावन काल वसंत, सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी मानकर चरित्र और धर्म के आदर्श श्रीराम रूप को इस पावन धरती पर चैत्र शुक्ल नवमी को
अवतरित किया।इसी दिन दयानंद सरस्वती जी ने आर्यसमाज की और वेदों की ओर लौटने का उपदेश दिया । 

      यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है । संसारव्यापी निर्मलता और कोमलता के बीच प्रकट होता है हमारा अपना नया साल "विक्रम संवत्सर विक्रम संवत" का संबंध हमारे कालचक्र से ही नहीं, बल्कि हमारे सुदीर्घ साहित्य और जीवन जीने की विविधता से भी है।

    चैत्र मास का वैदिक नाम है- मधु मास, मधु मास अर्थात आनंद बांटती वसंत का मास। यह वसंत आ तो जाता है फाल्गुन में ही, पर पूरी तरह से व्यक्त चैत्र में होता है । सारी वनस्पति और सृष्टि पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में प्रस्फुटित होती है । चारों ओर पकी फसल का दर्शन होता है जो आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई , हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें मनमोहक होती है।

     चैत्र क्या आता है मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा जाती है, पर शायद इस बार ऐसा कुछ न हो क्योंकि हम सभी ने स्वार्थवश प्रकृति को जाने-अनजाने नष्ट करके व स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने की महत्वाकांक्षा ने ऐसी महामारी की ओर उन्मुख कर दिया कि ईश्वर व प्रकृति ने स्वयं को संतुलित व हम सभी को एहसास कराने का एक मौका दे रही है कि मानव समाज की मानवता को कायम रखें और प्रकृति से सामंजस्य बनाये नहीं तो विज्ञान- तकनीकी व स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने की महत्वाकांक्षा पल भर में धराशाही होने में वक्त नहीं लगेगा।

           चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जो वार होता है वह ही वर्ष में संवत्सर का राजा कहा जाता है , इस दिन सूर्य मेष राशि मे होता है।

        सूर्य-चंद्र और ग्रह-नक्षत्रों पर आधारित हिंदू महीनों का नाम रखा गया है. जैसे- चित्रा नक्षत्र के आधार पर चैत्र, विशाखा के आधार पर बैसाख, ज्येष्ठा के आधार पर ज्येष्ठ, उत्तराषाढ़ा पर आषाढ़, श्रवण के आधार पर श्रावण आदि।

       हिंदू पंचांग की गणना के आधार पर यह कई हजारों साल पहले बता दिया था कि किस दिन, किस समय पर सूर्यग्रहण होगा,जो आज भी यह गणना सही और सटीक साबित हो रही है.तिथि घटे या बढ़े, लेकिन सूर्यग्रहण सदैव अमावस्या को होगा और चंद्रग्रहण पूर्णिमा को ही होगा तय है। इस आधार पर दिन-रात, सप्ताह, महीने, साल और ऋतुओं का निर्धारण हुआ। वैदिक परंपरा में 12 महीनों और 6 ऋतुओं के चक्र यानी पूरे वर्ष की अवधि को संवत्सर नाम दिया गया। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण तिथि माना गया है। विक्रम संवत् भारतवर्ष के सम्राट विक्रमादित्य ने शुरू किया था.चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के जिस दिन (वार) से विक्रमी संवत शुरू होता है, वही इस संवत का राजा होता है. सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करता है, तो वह संवत का मंत्री होता है। समस्त शुभ कार्य इसी पंचांग की तिथि से ही किए जाते  है।
(धर्मेंद्र कुमार चौरसिया अयोध्या)

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